हरिशंकर परसाई के व्यंग्य साहित्य में सामाजिक न्याय और जनचेतना

Authors

  • Dr. Premchand Government Degree College, Budaun, Uttar Pradesh, India Author

Keywords:

हरिशंकर परसाई, सामाजिक न्याय, जनचेतना, लोकतंत्र, लोकतांत्रिक मूल्य, सामाजिक आलोचना

Abstract

हरिशंकर परसाई आधुनिक हिन्दी व्यंग्य साहित्य के ऐसे प्रतिनिधि रचनाकार हैं जिन्होंने व्यंग्य को केवल हास्य अथवा मनोरंजन का माध्यम न मानकर सामाजिक हस्तक्षेप, वैचारिक प्रतिरोध और लोकतांत्रिक चेतना के प्रभावी उपकरण के रूप में प्रतिष्ठित किया। उनका समग्र साहित्य स्वतंत्रता-उत्तर भारतीय समाज में व्याप्त सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक विसंगतियों का यथार्थपरक और निर्भीक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। परसाई का व्यंग्य सत्ता, नौकरशाही, धार्मिक पाखंड, जातिगत असमानता, भ्रष्टाचार, मध्यवर्गीय अवसरवाद तथा नैतिक पतन जैसी समस्याओं पर तीखा प्रहार करते हुए सामाजिक न्याय, समानता, विवेकशीलता और मानवीय गरिमा की स्थापना का आग्रह करता है। उनकी रचनाओं में जनसाधारण की पीड़ा, लोकतांत्रिक मूल्यों के क्षरण तथा शोषित वर्ग की आकांक्षाओं का सशक्त चित्रण मिलता है, जिससे उनका साहित्य जनचेतना के निर्माण का प्रभावी माध्यम बन जाता है। प्रस्तुत शोध-पत्र का उद्देश्य हरिशंकर परसाई के व्यंग्य साहित्य में निहित सामाजिक न्याय और जनचेतना के विविध आयामों का आलोचनात्मक विश्लेषण करना है। अध्ययन गुणात्मक, विश्लेषणात्मक तथा व्याख्यात्मक शोध-पद्धति पर आधारित है, जिसमें परसाई की प्रमुख व्यंग्य रचनाओं का पाठ-विश्लेषण करते हुए यह स्पष्ट किया गया है कि उनका व्यंग्य केवल व्यवस्था-विरोधी अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन की वैचारिक परियोजना है। शोध का निष्कर्ष यह प्रतिपादित करता है कि परसाई का साहित्य लोकतांत्रिक मूल्यों की पुनर्स्थापना, सामाजिक समानता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा सक्रिय नागरिक चेतना के विकास में आज भी समान रूप से प्रासंगिक है।

 

 

Downloads

Download data is not yet available.

Author Biography

  • Dr. Premchand, Government Degree College, Budaun, Uttar Pradesh, India

    Assistant Professor
    Department of Hindi
    Government Degree College, Buduan, Uttar Pradesh, India

References

[1] परसाई, हरिशंकर. (2004). विकलांग श्रद्धा का दौर. नई दिल्ली: राजकमल प्रकाशन।

[2] परसाई, हरिशंकर. (2008). सदाचार का ताबीज. नई दिल्ली: राजकमल प्रकाशन।

[3] परसाई, हरिशंकर. (2009). भोलाराम का जीव. नई दिल्ली: राजकमल प्रकाशन।

[4] परसाई, हरिशंकर. (2006). इंस्पेक्टर मातादीन चाँद पर. नई दिल्ली: राजकमल प्रकाशन।

[5] परसाई, हरिशंकर. (2008). ठिठुरता हुआ गणतंत्र. नई दिल्ली: राजकमल प्रकाशन।

[6] परसाई, हरिशंकर. (2007). वैष्णव की फिसलन. नई दिल्ली: राजकमल प्रकाशन।

[7] परसाई, हरिशंकर. (2008). प्रेमचंद के फटे जूते. नई दिल्ली: राजकमल प्रकाशन।

[8] परसाई, हरिशंकर. (2007). निठल्ले की डायरी. नई दिल्ली: राजकमल प्रकाशन।

[9] परसाई, हरिशंकर. (2004). हरिशंकर परसाई रचनावली (खंड–1). नई दिल्ली: राजकमल प्रकाशन।

[10] परसाई, हरिशंकर. (2004). हरिशंकर परसाई रचनावली (खंड–2). नई दिल्ली: राजकमल प्रकाशन।

[11] परसाई, हरिशंकर. (2004). हरिशंकर परसाई रचनावली (खंड–3). नई दिल्ली: राजकमल प्रकाशन।

[12] परसाई, हरिशंकर. (2004). हरिशंकर परसाई रचनावली (खंड–4). नई दिल्ली: राजकमल प्रकाशन।

[13] परसाई, हरिशंकर. (2004). हरिशंकर परसाई रचनावली (खंड–5). नई दिल्ली: राजकमल प्रकाशन।

[14] परसाई, हरिशंकर. (2004). हरिशंकर परसाई रचनावली (खंड–6). नई दिल्ली: राजकमल प्रकाशन।

[15] सिंह, नामवर. (2006). इतिहास और आलोचना. नई दिल्ली: राजकमल प्रकाशन।

[16] शर्मा, रामविलास. (2009). साहित्य और समाज. नई दिल्ली: राजकमल प्रकाशन।

[17] पाण्डेय, मैनेजर. (2004). साहित्य के समाजशास्त्र की भूमिका. नई दिल्ली: वाणी प्रकाशन।

[18] राय, गोपाल. (2014). हिन्दी साहित्य का इतिहास. नई दिल्ली: राजकमल प्रकाशन।

[19] सिंह, बच्चन. (2008). हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास. नई दिल्ली: राधाकृष्ण प्रकाशन।

[20] त्रिपाठी, विश्वनाथ. (2006). देश के इस दौर में. नई दिल्ली: राजकमल प्रकाशन।

[21] शुक्ल, रामचन्द्र. (2018). हिन्दी साहित्य का इतिहास. नई दिल्ली: प्रभात प्रकाशन।

[22] अम्बेडकर, भीमराव रामजी. (2020). जाति का विनाश (हिन्दी अनुवाद). नई दिल्ली: गौतम बुक सेंटर।

[23] अग्रवाल, पुरुषोत्तम. (2011). संस्कृति: वर्चस्व और प्रतिरोध. नई दिल्ली: राजकमल प्रकाशन।

[24] दुबे, श्यामाचरण. (2007). भारतीय समाज. नई दिल्ली: राष्ट्रीय पुस्तक न्यास (NBT), भारत।

[25] भारत सरकार. (2023). भारत का संविधान (हिन्दी संस्करण). नई दिल्ली: विधि एवं न्याय मंत्रालय।

Downloads

Published

2026-06-30

How to Cite

हरिशंकर परसाई के व्यंग्य साहित्य में सामाजिक न्याय और जनचेतना. (2026). International Journal of Languages, Literature and Linguistic Research (IJLLR), 1(1), 34-50. https://ijllr.nobleinkresearch.com/1/article/view/5