परिवर्तनशील स्त्री-पुरुष संबंध और पारिवारिक-सामाजिक अंतर्विरोध : बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक के हिंदी उपन्यासों का आलोचनात्मक अध्ययन
DOI:
https://doi.org/10.68219/tzqe1s51Keywords:
स्त्री-पुरुष संबंध, पारिवारिक अंतर्विरोध, सामाजिक परिवर्तन, सामाजिक यथार्थ, स्त्री अस्मिताAbstract
बीसवीं शताब्दी का अंतिम दशक भारतीय समाज में तीव्र सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और वैचारिक परिवर्तन का दौर रहा है। उदारीकरण, नगरीकरण, शिक्षा के विस्तार, रोजगार के बदलते अवसर तथा स्त्री की बढ़ती सामाजिक सक्रियता ने पारंपरिक स्त्री-पुरुष संबंधों और पारिवारिक संरचनाओं को गहराई से प्रभावित किया। इन परिवर्तनों का प्रभाव हिंदी उपन्यासों में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, जहाँ स्त्री-पुरुष संबंध केवल प्रेम और विवाह तक सीमित न रहकर अस्मिता, स्वतंत्रता, सत्ता, लैंगिक समानता, भावनात्मक आकांक्षाओं और सामाजिक नैतिकता के प्रश्नों से जुड़ते हैं। प्रस्तुत शोध बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक में प्रकाशित चयनित हिंदी उपन्यासों का आलोचनात्मक अध्ययन करते हुए बदलते स्त्री-पुरुष संबंधों तथा उनसे उत्पन्न पारिवारिक और सामाजिक अंतर्विरोधों का विश्लेषण करता है। अध्ययन में विशेष रूप से स्त्री की आत्मचेतना, पितृसत्तात्मक संरचनाओं के प्रति प्रतिरोध, दांपत्य संबंधों में तनाव, प्रेम और विवाह की बदलती अवधारणाओं तथा परिवार और व्यक्ति के बीच उत्पन्न संघर्षों को केंद्र में रखा गया है। साथ ही, यह शोध आधुनिकता और परंपरा के द्वंद्व तथा बदलती सामाजिक परिस्थितियों के संदर्भ में पारिवारिक संबंधों के पुनर्गठन को भी रेखांकित करता है। चयनित उपन्यासों के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि इस दौर का हिंदी उपन्यास स्त्री-पुरुष संबंधों को स्थिर सामाजिक संस्था के रूप में स्वीकार करने के बजाय उन्हें परिवर्तनशील सामाजिक यथार्थ, व्यक्तिगत आकांक्षाओं और लैंगिक सत्ता-संबंधों के संदर्भ में देखने की नई दृष्टि विकसित करता है। इस प्रकार, अंतिम दशक के हिंदी उपन्यास तत्कालीन भारतीय समाज में हो रहे व्यापक परिवर्तन और उसके अंतर्विरोधों के महत्त्वपूर्ण साहित्यिक दस्तावेज के रूप में सामने आते हैं।
Downloads
References
1. मैनेजर पाण्डेय, अग्रवाल. (2009). साहित्य और इतिहास-बोध. वाणी प्रकाशन।
2. शशिकला, आचार्य. (2005). हिंदी उपन्यास में स्त्री जीवन. साहित्य संचय।
3. रामदरश, उपाध्याय. (2006). हिंदी उपन्यास के सौ वर्ष. राजकमल प्रकाशन।
4. ओमप्रकाश, वाल्मीकि. (2003). दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र. राधाकृष्ण प्रकाशन।
5. कात्यायनी. (2007). दुर्ग द्वार पर दस्तक. राजकमल प्रकाशन।
6. कृष्णा, सोबती. (1993). ऐ लड़की. राजकमल प्रकाशन।
7. सुरेश, गुप्त. (2004). हिंदी उपन्यास : बदलते संदर्भ. साहित्य भवन।
8. नंदकिशोर, चतुर्वेदी. (2008). हिंदी उपन्यास और सामाजिक यथार्थ. लोकभारती प्रकाशन।
9. चित्रा, मुद्गल. (1995). आवां. सामयिक प्रकाशन।
10. निर्मला, जैन. (2008). हिंदी आलोचना : बीसवीं शताब्दी. राजकमल प्रकाशन।
11. प्रभा, खेतान. (2004). स्त्री उपेक्षिता. हिंदी माध्यम कार्यान्वय निदेशालय।
12. मैत्रेयी, पुष्पा. (1994). इदन्नमम. राजकमल प्रकाशन।
13. सुधा, पांडेय. (2006). हिंदी उपन्यास में स्त्री विमर्श. वाणी प्रकाशन।
14. राजी, सेठ. (1999). तत्-सम. भारतीय ज्ञानपीठ।
15. राजेंद्र, यादव. (2007). कहानी : स्वरूप और संवेदना. अक्षर प्रकाशन।
16. रामविलास, शर्मा. (2001). हिंदी साहित्य की भूमिका. राजकमल प्रकाशन।
17. नामवर, सिंह. (2005). कविता के नए प्रतिमान. राजकमल प्रकाशन।
18. प्रभा, स्त्रीवादी. (2010). स्त्री विमर्श और हिंदी साहित्य. वाणी प्रकाशन।
19. अलका, सेठ. (1998). कालिकथा : वाया बाइपास. भारतीय ज्ञानपीठ।
20. सविता, सिंह. (2000). स्त्री अस्मिता और हिंदी साहित्य. राजकमल प्रकाशन।
