"राम की शक्ति पूजा" में शक्ति की अवधारणा और निराला का नवजागरण बोध
DOI:
https://doi.org/10.68219/1a1p1m41Keywords:
राम की शक्ति पूजा, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला, आत्मजागरण, राम का मानवीकरण, पौराणिक पुनर्पाठAbstract
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की राम की शक्ति पूजा हिंदी साहित्य की उन महत्वपूर्ण काव्य-कृतियों में है, जिनमें पौराणिक आख्यान को आधुनिक जीवन-बोध और सामाजिक चेतना के साथ पुनर्परिभाषित किया गया है। प्रस्तुत शोध का उद्देश्य कविता में निहित ‘शक्ति’ की अवधारणा का विश्लेषण करते हुए उसके संबंध को निराला के नवजागरण-बोध से स्थापित करना है। कविता में राम पारंपरिक सर्वशक्तिमान देवता के रूप में नहीं, बल्कि संशय, निराशा, आत्मसंघर्ष और संघर्षशीलता से गुजरने वाले मनुष्य के रूप में सामने आते हैं। रावण के विरुद्ध युद्ध की बाहरी चुनौती के साथ-साथ राम के भीतर चलने वाला आत्मसंघर्ष कविता को एक गहरे मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक आयाम प्रदान करता है। शक्ति-आराधना इस संदर्भ में केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मबल, संकल्प, आत्मजागरण और परिवर्तनकारी चेतना की प्रक्रिया बन जाती है। अध्ययन यह विश्लेषित करता है कि निराला भारतीय पौराणिक परंपरा का पुनर्पाठ करते हुए शक्ति को किस प्रकार आधुनिक मनुष्य की संघर्षशील चेतना से जोड़ते हैं। राम का मानवीकरण, उनकी आत्मपीड़ा, संकल्प और शक्ति की पुनर्प्राप्ति परंपरा और आधुनिकता के बीच एक महत्वपूर्ण वैचारिक सेतु निर्मित करते हैं। कविता में शक्ति की अवधारणा व्यक्तिगत आत्मबल से आगे बढ़कर सामाजिक और सामूहिक जागरण की संभावना का संकेत देती है। इस दृष्टि से राम की शक्ति पूजा में मिथक केवल अतीत की स्मृति नहीं रहता, बल्कि वर्तमान को संबोधित करने वाला सक्रिय सांस्कृतिक माध्यम बन जाता है। शोध का केंद्रीय तर्क है कि निराला के लिए शक्ति बाहरी दैवी सत्ता मात्र नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर निहित आत्मचेतना, संघर्षशीलता और परिवर्तन की ऊर्जा का प्रतीक है। इसी रूपांतरण के माध्यम से कविता में परंपरा के पुनर्मूल्यांकन, आधुनिक विवेक और नवजागरण की चेतना का सशक्त समन्वय दिखाई देता है।
Downloads
References
1. अग्रवाल, रामविलास. (1987). निराला की साहित्य साधना. राजकमल प्रकाशन.
2. अग्रवाल, रामविलास. (1996). भारतीय साहित्य की भूमिका. राजकमल प्रकाशन.
3. अज्ञेय, सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन. (1985). आत्मनेपद. भारतीय ज्ञानपीठ.
4. आचार्य, रामचंद्र शुक्ल. (2002). हिंदी साहित्य का इतिहास. नागरी प्रचारिणी सभा.
5. गुप्त, गणपति चंद्र. (1974). हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास. लोकभारती प्रकाशन.
6. निराला, सूर्यकांत त्रिपाठी. (2005). राग-विराग. लोकभारती प्रकाशन.
7. निराला, सूर्यकांत त्रिपाठी. (2007). अनामिका. लोकभारती प्रकाशन.
8. निराला, सूर्यकांत त्रिपाठी. (2010). परिमल. लोकभारती प्रकाशन.
9. निराला, सूर्यकांत त्रिपाठी. (2012). कविता के कान. लोकभारती प्रकाशन.
10. पंत, सुमित्रानंदन. (2004). पल्लव. राजकमल प्रकाशन.
11. प्रसाद, जयशंकर. (2009). कामायनी. राजकमल प्रकाशन.
12. शर्मा, रामविलास. (1983). निराला की साहित्य साधना: जीवन और व्यक्तित्व. राजकमल प्रकाशन.
13. शर्मा, रामविलास. (1988). निराला की साहित्य साधना: भाषा और छंद. राजकमल प्रकाशन.
14. शुक्ल, रामचंद्र. (2002). चिंतामणि: भाग 1. नागरी प्रचारिणी सभा.
15. द्विवेदी, हजारीप्रसाद. (1996). हिंदी साहित्य: उद्भव और विकास. राजकमल प्रकाशन.
16. द्विवेदी, हजारीप्रसाद. (2004). कबीर. राजकमल प्रकाशन.
17. नामवर सिंह. (2001). छायावाद. राजकमल प्रकाशन.
18. नामवर सिंह. (2005). इतिहास और आलोचना. राजकमल प्रकाशन.
19. नगेन्द्र. (2003). हिंदी साहित्य का इतिहास. नेशनल पब्लिशिंग हाउस.
20. नगेन्द्र. (2004). आधुनिक हिंदी कविता की प्रमुख प्रवृत्तियाँ. नेशनल पब्लिशिंग हाउस.
